स्वप्न अधूरे कह रहे
चलो गगन की ठाँव।
काँटे साथी राह के
मंजिल खड़ी सुदूर
बोल उठे हैं घाव भी
थक कर होते चूर
बनी पैंजनी बेड़ियाँ
घायल करती पाँव।।
मन पक्षी बन उड़ रहा
मार कुलाँचे जोर
फिर सूरज की रश्मियाँ
पकड़ाती हैं छोर
देख हुए तब बावरे
शीघ्र मिले वो गाँव।।
ख्याली पुलाव कब पके
चाहे भट्टी आँच
ताप सहे परिश्रम का
फिर निखरे है काँच
नैन खोल के सो रहे
मुस्काती तब छाँव।।
अनिता सुधीर
चित्र गूगल से