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अब आत्म बोध का हो विचार।
सुन मातु भारती की पुकार।।
बलिदान कृत्य से अमर आज
हम चुका सकें उनका उधार।।
माघ के दोहे हाड़ कॅंपाते माघ में,गृहणी है लाचार। दुबके लोग लिहाफ में,माँगे स्वाद अपार।। कांप कांप कर उंगलियां,बीनें बथुआ साग। इन जोड़ों के द...
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