बाल मन
चांद देखा जब सिया ने,भाव कोमल हँस पड़े हैं।
दृश्य पावन यह मनोरम,कल्पना लेकर उड़े हैं।।
शब्द की सामर्थ्य कहती,बचपना कब लिख सके हम
ओट से आ चांद बोले,हम निकट ही नित खड़े हैं।।
अनिता सुधीर आख्या
शुभ दिन आयुर्वेद का,मना रहे सब लोग। वैज्ञानिक आधार का,उत्तम है संयोग।। शरद विषुव के काल में,होते सम दिन-रात। हो जीवन में संतुलन,समझें सब यह...
हम निकट ही नित खड़े हैं। बहुत सुंदर
ReplyDeleteधन्यवाद
Deleteवाह
ReplyDeleteसुंदर
ReplyDeleteधन्यवाद आ0
Deleteइतने सुंदर भाव! प्रशंसा हेतु शब्द ही नहीं हैं।
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