Friday, May 22, 2020

दर्पण



दर्पण  को आईना दिखाने का प्रयास किया है

    दर्पण
*********
दर्पण, तू लोगों को
आईना दिखाता है
बड़ा अभिमान है  तुम्हें
अपने  पर ,
कि तू  सच दिखाता है।
आज तुम्हे  दर्पण,
दर्पण दिखाते हैं!
क्या अस्तित्व तुम्हारा टूट
बिखर नहीं जाएगा
जब तू उजाले का संग
 नहीं पाएगा
माना तू माध्यम आत्मदर्शन का
पर आत्मबोध तू कैसे करा पाएगा
बिंब जो दिखाता है
वह आभासी और पीछे बनाता है
दायें  को बायें
करना तेरी फितरत है
और फिर तू इतराता  है
 कि तू सच बताता है ।
माना तुम हमारे बड़े काम के ,
समतल हो या वक्र लिए
पर प्रकाश पुंज के बिना
तेरा कोई अस्तित्व नहीं ।
दर्पण को दर्पण दिखलाना
मन्तव्य  नहीं,
लक्ष्य है आत्मशक्ति
के प्रकाश पुंज से
गंतव्य तक जाना ।

अनिता सुधीर

14 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 22 मई 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार(२३-०५-२०२०) को 'बादल से विनती' (चर्चा अंक-३७१०) पर भी होगी
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का
    महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    **
    अनीता सैनी

    ReplyDelete
  3. जी हार्दिक आभार

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  4. बहुत अच्छी कविता |ब्लॉग पर आने हेतु हार्दिक आभार |

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  5. लक्ष्य है आत्मशक्ति
    के प्रकाश पुंज से
    गंतव्य तक जाना ।

    - What a lovely thing to say, and really deep!

    ये पंक्तियाँ अपने आप में काफी हैं!

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    Replies
    1. जी आप की स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार

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  6. दर्पण को दर्पण दिखलाना
    सबके बस की बात नहीं।
    --
    अच्छी रचना।

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    Replies
    1. जी आप की स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार

      Delete
  7. आ अनीता सुधीर जी, आपने सचमुच दर्पण को दर्पण दिकह दिया। दर्पण में प्रतिबिम्ब तभी भासित होता है, जब प्रकाश हो। सही दृष्टि!--ब्रजेंद्रनाथ

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    Replies
    1. जी आप की स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार

      Delete
  8. माना तू माध्यम आत्मदर्शन का
    पर आत्मबोध तू कैसे करा पाएगा
    बिंब जो दिखाता है
    वह आभासी और पीछे बनाता है
    दायें को बायें
    करना तेरी फितरत है
    और फिर तू इतराता है
    कि तू सच बताता है ।
    बहुत खूब...सुन्दर सार्थक
    लाजवाब सृजन
    वाह!!!

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