नारी का अपमान कर,करते क्यों उपभोग।
विज्ञापन में छाप के ,कैसा करा प्रयोग ।
कैसा करा प्रयोग ,समझते भोग्या उसको।
हुआ पतन जो आज,कहाँ चिंता अब किसको।
सकल सृजन की सार ,वस्तु बनती बेचारी ।
रही धुरी परिवार,प्रेम की मूरत नारी ।
माघ के दोहे हाड़ कॅंपाते माघ में,गृहणी है लाचार। दुबके लोग लिहाफ में,माँगे स्वाद अपार।। कांप कांप कर उंगलियां,बीनें बथुआ साग। इन जोड़ों के द...
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