Monday, September 30, 2019

माँ दुर्गा के नौ रूप में जीवन के विभिन्न आयाम
***
माँ दुर्गा के नौ रूप है इस जीवन का  आधार
कल्याणकारिणी देवी करतीं जन जन का उद्धार।

शैलपुत्री माता  तुम नव चेतना का संचार करो
ब्रहमचारिणी माता ,अनंत दिव्यता से मन भरो ।

चन्द्रघण्टा मन की अभिव्यक्ति ,इच्छाओं को एकाग्र करो ।
कूष्मांडा प्राणशक्ति तुम   ऊर्जा का भंडार भरो ।

स्कंदमाता ज्ञानदेवी  कर्मपथ पर ले चलो
कात्यायनी माता तुम क्रोध का संहार करो ।

कालरात्रि माता तुम जीवन में शक्ति भरो
महागौरी माँ  सौंदर्य से दैदीप्यमान करो  ।

सिद्धिदात्री माता  जीवन मे पूर्णता प्रदान करो
नवदुर्गे माँ जन जन के जीवन को आलोकित करो ।

आत्मसात कर सके ये अलौकिक रूप तुम्हारे
ऐसी कृपा हम पर करो ,ऐसी कृपा हम पर करो ।


अनिता सुधीर
*दक्षिणा*

'मॉम पंडित जी का पेमेंट कर दो '
सुन कर इस पीढ़ी के श्रीमुख से
संस्कृति कोने में खड़ी कसमसाई थी
सभ्यता दम तोड़ती नजर आई थी ।

मैं घटना की मूक साक्षी बनी
पेमेंट और दक्षिणा में उलझी रही,
आते जाते गडमड करते विचारों को
आज के परिपेक्ष्य में सुलझाती रही।

दक्षिणा का सार्थक अर्थ बताने
 उम्मीद लिए बेटे के पास आई,
पूजन सम्पन्न कराने पर दी जाने
वाली श्रद्धापूर्वक  राशि बताई ।

एकलव्य और आरुणि की कथा सुना
गुरू दक्षिणा का महत्व समझाई ,
ब्राह्मण और गुरु  चरणों में नमन कर
उसे अपनी संस्कृति की दुहाई दे आईं ।

सुनते ही उसके चेहरे पर विद्रूप हँसी नजर आयी
ऐसे गुरु अब कहाँ मिलते मेरी भोली भाली माई ,
अकाट्य तर्कों से वो अपने को सही कहता रहा
मैं स्तब्ध उसे कर्तव्य निभाने को कहती आई ।

न ही वैसे गुरु रहे ,न ही वैसे शिष्य
दक्षिणा देने और लेने की सुपात्रता प्रश्नचिह्न बनी
विक्षिप्त सी मैं दो  कालखंड में भटकती रही,
दक्षिणा के सार्थक अर्थ को सिद्ध करती रही ।

प्रथम गुरू माँ  होने का मैं कर्तव्य  निभा न पाई
अपनी संस्कृति  संस्कार से अगली पीढ़ी को
परिचित करा न पाई
दोष मेरा भी था ,दोष उनका भी है
बदलते जमाने के साथ सभी ने तीव्र रफ्तार पाई।

असफल होने के बावजूद बेटे से अपनी दक्षिणा मांग आयी
तुम्हारे ,धन दौलत सोने चांदी ,मकान से सरोकार नहीं मुझे
बस तू नेक इंसान बन कर जी ले अपनी जिंदगी
इंसानियत रग रग में हो,उससे अपना पेमेंट माँग आयी।
©anita_sudhir

Sunday, September 29, 2019

हौसले परवाज हैं   

जीवन सागर की लहरों सा
हर लहर ,कदम इक साज है,
कभी शांत,कभी उथल पुथल,
हौसले परवाज हैं....

बाधाओं को हँस कर गले लगाते,
जब तूफाँ में डूब रहा जहाज है ,
उनके ही सर पर ताज है ,
जिनके हौसले परवाज हैं ....

वर्जनाओं की बेड़ियों में जकड़ी
बेटियां देने लगीं नित आवाज हैं,
छूती आसमां ,निराले अंदाज हैं
हौसले परवाज हैं ....

बेईमानों का करना इलाज है
ये मद में डूबे हुए गजराज हैं,
ले आयें जग में सुराज हैं ,
हौसले परवाज हैं....

फांसी पर झूलता किसान और
गोदामों में सड़ता अनाज है
आओ बदलें समाज के रिवाज
 हौसले परवाज हैं....

पालन उचित रीति रिवाज का,
सुखी जीवन का यही राज है ।
जीवन में होगा ऋतुराज ,
हौसले परवाज हैं....

उद्घोष है नव समाज का
धैर्य विवेक मिजाज है,
इलाज हुआ पत्थरबाज का
और हौसले  परवाज हैं....

स्वरचित
अनिता सुधीर












Saturday, September 28, 2019





गीतिका
*****
परहित सदा करते रहे विषपान है,
अंतर सरल है नेक वो धनवान है ।

क्यों आज फैला ये तमस चहुँ ओर है,
इसको मिटाना लक्ष्य प्रथम प्रधान है

उम्मीद का दीपक  सदा जलता रहे,
अब आंधियों को ये नया  प्रतिदान है।

दुःख काल में विसरित न हो स्थिर रहे
जग में सदा रहता वही बलवान है ।

रहते सजग जो देश हित में सर्वदा,
उन का सदा होता रहा गुणगान है ।

यूँ छोड़ के जाने कहाँ  वो अब चले,
विस्मृत कठिन स्मृति समाहित प्रान हैं।


मंथन
मुक्तक

मंथन का ये विष मुझे अब पीना होगा
बिन अमरत्व की चाह अब जीना होगा,
तुम गलत कभी हो सकते हो,भला
मुझे ही अपने होठों को अब सीना होगा ।


Friday, September 27, 2019




क्षणिकाएं
पोशाक
1)
अजर अमर आत्मा
बदलती रहती
नित नई पोशाक ,
पोशाक कभी वो
शीघ्र क्यों बदलती!
2)
एक पोशाक
दुखों के छिद्र से भरी हुई
अवसाद से छिद्र बढ़ते हुए
पैबंद लगाने बैठे छिद्रों
पर सुखों का ,
विश्वास के धागों से
सपने टांके,
लगन की सुनहरी जरी से
पोशाक बड़ी खूबसूरत नजर आई ।
3)
पोशाक पर
ऊँगली उठती बार बार
बच्चियों की पोशाक
बता दे कोई ।
4)
वर्दी बड़े सम्मान का विषय
कितनों की कुर्बानी 
वर्दी की आन शान में ,
एक मेडल और सजा था
 वर्दी पर
उसके जाने के बाद ।
5)
आज दुकान पर भीड़ बड़ी
पोशाक सिलवाने आये सभी,
सोचा सबकी एक सी सिल दूँ
इतनी शक्ति देना प्रभू!
सबकी पोशाक  में
धरा की हरियाली
केसरिया शक्ति दे दूँ
श्वेत हिमकणों की शीतलता से
प्रेम का रंग लाल भर दूँ ।
©anita_sudhir
स्वेद/पसीना
**
खेतों में
धूप के समंदर में
पसीने का दरिया
बहाता किसान!
पसीना नहीं ,लहू बहता है
तब किसान आधा पेट खा कर
दूसरों का पेट भरता है ।

सड़कों पर
पसीने के आगोश में
बोझे को गले लगाता मजदूर !
अपने लहू से सींच
दूजे का महल
खुद सड़क किनारे सो जाता है।

सीमा पर
जवान धूप में
खड़ा अपना फर्ज  निभाता !
अपनों की चिंता किये बिना
हमारी रक्षा में शहीद हो जाता है ।

घर में
पिता जीवन भर
परिवार के लिये
खून  पसीना बहाता !
स्वयं कम में गुजारा कर
अपना जीवन होम कर जाता ।

पसीने की स्याही
से लिखता जो
अपने जीवन के कोरे पन्ने!
 वो खून के आँसू नहीं
खुशियों के अश्कों से
जिंदगी भिगोया करता है।

आओ कान्हा मन हल्का कर लें

जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं  आओ कान्हा ! मन हल्का कर लें रस्म निभाने आते उत्सव घर की चौखट सकुचाए  दुविधा लेकर खड़ा हुआ मन स्वागत कैसे क...