कुंडलिया
अलाव
रातें ठंडी हो रहीं ,जलने लगे अलाव ।
रूप निराले शीत के,अलग अलग हैं भाव।।
अलग अलग हैं भाव ,कहीं मौसम की मस्ती,
रहता कहीं अभाव,सड़क पर रातें कटती।
करती क्या सरकार,करे क्या खाली बातें,
हम सब करें प्रयास ,सुखद हो सबकी रातें।।
शुभ दिन आयुर्वेद का,मना रहे सब लोग। वैज्ञानिक आधार का,उत्तम है संयोग।। शरद विषुव के काल में,होते सम दिन-रात। हो जीवन में संतुलन,समझें सब यह...
बहुत उम्दा
ReplyDeleteजी हार्दिक आभार
Deleteबहुत सुन्दर
ReplyDeleteजी सादर धन्यवाद आ0
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